आवरण कथा | BRICS 2026
BRICS 2026 में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता
140 बिंदुओं वाली नई दिल्ली घोषणा से बड़ा सवाल यह है—क्या भारत ऐसी स्थिति बना रहा है जहाँ संबंध सबके साथ हों, लेकिन निर्णय भारतीय हित तय करें?
दिल्ली के भारत मंडपम में जब BRICS देशों के नेता एक मेज पर बैठे थे, तब चर्चा केवल संयुक्त राष्ट्र, डॉलर, युद्ध और वैश्विक संस्थाओं की नहीं थी। उसका रिश्ता उस भारतीय परिवार से भी था जो पेट्रोल भरवाता है; उस छोटे उद्योग से, जिसका उत्पाद विदेशी बाजार में जाता है; उस युवा उद्यमी से, जिसे पूंजी और नया बाजार चाहिए; और उस कारखाने से भी, जिसे critical minerals और electronic components की निर्बाध आपूर्ति चाहिए।
यही BRICS 2026 को रोचक बनाता है। प्रश्न केवल यह नहीं कि सम्मेलन में कौन-सा प्रस्ताव पारित हुआ; बड़ा प्रश्न है—बदलती दुनिया में भारत अपने लिए कितनी निर्णय-स्वतंत्रता सुरक्षित कर सकता है?
Rule-taker से Rule-shaper तक
12–13 सितंबर को आयोजित 18वें शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता भारत ने की। प्रधानमंत्री ने Global South की स्थिति को इस तरह रखा कि जो देश संकटों की “front row” में होते हैं, वे निर्णय लेने की व्यवस्था में अक्सर “back row” में रहते हैं। प्रस्तावित दिशा थी—Global South को नियम मानने वाले से नियम गढ़ने वाले देशों की पंक्ति में लाना।
बीस वर्षों में BRICS ही नहीं, भारत भी बदला है
2006 के BRIC और 2026 के BRICS के बीच फर्क केवल सदस्य संख्या का नहीं है। भारत की आर्थिक क्षमता, digital infrastructure, international market presence और diplomatic reach भी बदली है। प्रधानमंत्री के अनुसार BRICS और उसके partners मिलकर विश्व की लगभग 50% आबादी, 40% GDP और 25% से अधिक global trade का प्रतिनिधित्व करते हैं।
भारत के सामने सरल चुनाव नहीं है। अमेरिका बाजार और उच्च तकनीक में अहम है; यूरोप व्यापार, पूंजी और advanced manufacturing में; रूस energy और defence में; जबकि चीन प्रतिस्पर्धी होने के साथ industrial supply chains का बड़ा स्रोत भी है। भारत की चुनौती किसी एक पक्ष को चुनना नहीं, बल्कि किसी एक शक्ति को अपने विकल्पों पर “veto” न देने की है।
BRICS भारत के लिए पश्चिम-विरोधी खेमे से अधिक अतिरिक्त बाजार, भुगतान-मार्ग और diplomatic bargaining space देने वाला मंच है।
100% tariff का दबाव: भारत कितनी कीमत पर अपनी पसंद बचाएगा?
BRICS की बहस में Donald Trump की तस्वीर सजावटी नहीं, संदर्भ समझने के लिए जरूरी है। फरवरी 2025 में उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि BRICS देश डॉलर को चुनौती देने वाली साझा currency की दिशा में बढ़ते हैं, तो उन पर 100% tariff लगाया जा सकता है। यह एक राजनीतिक चेतावनी थी; BRICS ने 2026 में कोई साझा मुद्रा घोषित नहीं की।
दो अलग “100%” — इन्हें मिलाना नहीं चाहिए
सितंबर 2026 में दूसरा, अधिक व्यावहारिक दबाव सामने आया। अमेरिका के नए Russia-Iran sanctions कानून ने राष्ट्रपति को रूसी oil या gas के महत्वपूर्ण buyers से आने वाले imports पर 100% तक tariff लगाने की व्यापक शक्ति दी। भारत के लिए यह सीधे energy security और US market access के बीच कठिन संतुलन का प्रश्न बन सकता है।
भारत दुनिया का बड़ा oil importer है। रूस से खरीद केवल राजनीतिक निकटता का विषय नहीं; कीमत, refinery economics, supply availability और domestic inflation भी उसके पीछे हैं। दूसरी ओर अमेरिका भारतीय exports का अत्यंत महत्वपूर्ण बाजार है। यानी नीति का एक निर्णय petrol pump से लेकर export order तक असर डाल सकता है।
भारत के लिए strategic autonomy का अर्थ “किसी के खिलाफ” होना नहीं; बाहरी दबाव के बीच अपने निर्णय की गुंजाइश बचाए रखना है।
डॉलर हटाना नहीं—दूसरा रास्ता खुला रखना
New Delhi Declaration के para 90 में BRICS Payment Task Force, payment-system interoperability और BRICS local currencies में trade settlements व investments की संभावनाओं पर काम जारी रखने की बात है। साथ ही declaration साफ कहती है कि कोई “one-size-fits-all” मॉडल नहीं है। यानी अभी न BRICS central bank है, न साझा currency, न डॉलर का तत्काल विकल्प। भारत के लिए उपयोगिता अधिक व्यावहारिक है: यदि किसी route पर sanction, banking restriction या transaction cost बढ़े, तो वैकल्पिक payment channel उपलब्ध हो। यह de-dollarisation के नारे से अधिक financial resilience का सवाल है।
Ukraine: घोषणा की अर्थपूर्ण चुप्पी
2026 की New Delhi Declaration में Ukraine का अलग उल्लेख नहीं है—जबकि Rio 2025 declaration में conflict का संक्षिप्त संदर्भ था। इसे किसी एक कारण से जोड़ना अनुमान होगा; पर इतना स्पष्ट है कि विस्तारित BRICS की सामूहिक भाषा वहीं तक जाती है जहाँ consensus संभव हो। भारत की राष्ट्रीय भाषा इससे अलग और अधिक स्पष्ट रही। BRICS sidelines पर Vladimir Putin से बातचीत में प्रधानमंत्री ने West Asia और Black Sea region के conflicts के प्रभाव—maritime trade और भारतीय seafarers की सुरक्षा—पर चर्चा की और dialogue तथा diplomacy को समाधान का रास्ता बताया। सितंबर की शुरुआत में Kyiv में विदेश मंत्री ने भी कहा कि केवल रूसी oil खरीद बंद कर देने से युद्ध समाप्त नहीं होगा; शांति के लिए negotiation आवश्यक है।
China: सहयोग भी, निर्भरता का प्रश्न भी
BRICS में भारत की सबसे जटिल relationship चीन के साथ है। सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता को संबंधों के विकास का आवश्यक आधार माना गया, साथ ही structural trade imbalance, supply-chain issues और predictable market access जैसे आर्थिक मुद्दे भी महत्वपूर्ण बने रहे।
भारत चीन से manufacturing inputs और कई critical components लेता है, लेकिन किसी एक देश के हाथ में ऐसी supply-chain leverage भी नहीं चाहता जो संकट के समय production रोक दे। इसलिए भारत की दिशा “China या no China” से अधिक “China plus alternatives” जैसी दिखाई देती है—सहयोग जहाँ संभव हो, पर strategic dependence को धीरे-धीरे कम करना।
West Asia और युद्ध की भाषा: सहमति कहाँ तक?
New Delhi Declaration भारत का एकतरफा बयान नहीं, BRICS का consensus document है। इसलिए “भारत ने Israel की निंदा की” कहना अधूरा होगा। फिर भी भारत ने उसे सामूहिक भाषा में स्वीकार किया, और वह Gaza-Palestine पर काफी स्पष्ट है। Declaration ने humanitarian aid, civilians की सुरक्षा, forced displacement के विरोध, Palestinian self-determination और two-state solution का समर्थन दोहराया। उसने Palestine की पूर्ण UN membership का भी समर्थन किया और 1967 borders पर आधारित independent Palestinian state की established formulation स्वीकार की। Lebanon में Israeli forces की उपस्थिति पर वापसी की मांग भी दर्ज हुई। यह भारत की स्वतंत्र Israel policy को समाप्त नहीं करता। भारत Israel के साथ strategic relations बनाए रखता है और साथ ही Palestinian statehood तथा negotiated two-state solution का समर्थन करता है। यानी भारत की West Asia policy को “एक पक्ष चुनना” कम और competing interests को manage करना अधिक सही होगा।
Iran-UAE मतभेद और “maximum restraint”
West Asia पर consensus आसान नहीं था। Iran BRICS member है; UAE भी उसी table पर है, लेकिन regional alignments अलग हैं। मई 2026 में BRICS foreign ministers common statement तक नहीं ला पाए थे। सितंबर summit में declaration ने “maximum restraint”, sovereignty, civilian protection और dialogue-diplomacy की भाषा अपनाई। भारत के लिए इसका अर्थ सीधे आर्थिक है। Hormuz और Gulf की अस्थिरता तेल, LNG, shipping cost, insurance premium और भारतीय प्रवासी समुदाय पर असर डाल सकती है। इसलिए West Asia में शांति भारत के लिए केवल नैतिक स्थिति नहीं—energy और economic security भी है।
आतंकवाद पर सहमति, लेकिन नाम नहीं
Pahalgam terror attack की निंदा और terrorism पर zero tolerance महत्वपूर्ण है, लेकिन declaration Pakistan का नाम नहीं लेती। यह संतुलित भाषा जरूरी है—BRICS भारत को मंच और language देता है, पर वह अपने-अपने geopolitical समीकरणों का स्थान नहीं ले सकता।
इसलिए भारत की West Asia policy को “एक पक्ष चुनना” कम और competing interests को manage करना अधिक सही होगा। Hormuz और Gulf की अस्थिरता तेल, LNG, shipping cost, insurance premium और भारतीय प्रवासी समुदाय पर असर डाल सकती है।
BRICS की असली परीक्षा: घोषणा से क्रियान्वयन तक
नई दिल्ली की 140-बिंदु declaration महत्वाकांक्षी है, पर असली कसौटी implementation है। क्या local-currency payments बड़े scale पर चलेंगे? क्या NDB local-currency finance बढ़ाएगा? क्या critical-mineral supply chains सच में diversified होंगी? क्या India-China trade imbalance कम होगा? इन प्रश्नों के उत्तर अभी भविष्य में हैं।
“India is destined to rise in a very turbulent world.”
15 सितंबर 2026 के ICWA संबोधन में विदेश मंत्री ने strategic autonomy, multipolarity, tariff volatility, technology rivalry और supply-chain vulnerabilities को भारतीय कूटनीति के दीर्घकालीन प्रश्नों से जोड़ा।
UNSC, सुधार और Global South
Declaration में China और Russia ने India और Brazil की UN, including Security Council, में “greater role” की aspiration का समर्थन दोहराया। इसे permanent seat की स्पष्ट स्वीकृति कहना सही नहीं होगा।
India-centric दृष्टि से BRICS का मूल्य यह है कि यह भारत को ऐसी strategic space देता है जहाँ वह अमेरिका और यूरोप के साथ partnerships बनाए रखते हुए Russia, China, Gulf और Global South के साथ भी अपने हित साध सके। लक्ष्य dependencies खत्म करना नहीं, उन्हें diversify करना है।
Global South से Bastar तक: छत्तीसगढ़ के लिए अर्थ
New Delhi Declaration में Chhattisgarh या Naxalism का सीधा उल्लेख नहीं है। फिर भी उसके कई themes राज्य से जुड़ते हैं। पहला, critical minerals। अगस्त 2026 में केंद्र ने Chhattisgarh के पाँच critical और strategic mineral blocks को auction tranche में शामिल किया। BRICS resource-rich क्षेत्रों में value addition और diversified supply chains पर जोर देता है। इससे processing, advanced materials और downstream manufacturing के अवसर बन सकते हैं।
दूसरा, mining-steel economy। Chhattisgarh FY26 में भारत के mineral production value का लगभग 13.4% हिस्सा देता है। भिलाई-रायपुर का steel और engineering ecosystem global trade rules, carbon-related barriers और resilient supply chains से सीधे प्रभावित हो सकता है।
तीसरा, Bastar का post-conflict development। केंद्र सरकार ने 2026 में Bastar और देश को Naxal-free घोषित करने का दावा किया है। BRICS declaration इसका उल्लेख नहीं करती; फिर भी skills, MSME, digital connectivity, agriculture और local value chains जैसे विषय अगले विकास-चरण से जुड़ सकते हैं। सुरक्षा उपलब्धि तभी टिकाऊ होगी जब शिक्षा, रोजगार और स्थानीय उद्यमिता साथ बढ़ें।
चौथा, agriculture और forest livelihoods। BRICS AGRIN, regenerative agriculture और digital agriculture networks छोटे किसानों, seed systems, climate resilience और traditional knowledge पर सहयोग खोलते हैं। Chhattisgarh जैसे धान और forest-produce आधारित राज्य के लिए उपयोगिता तभी होगी जब national programmes इन्हें स्थानीय producers तक पहुँचाएँ।
छत्तीसगढ़ की mineral economy, Bhilai-Raipur steel और engineering ecosystem global trade rules, carbon-related barriers तथा resilient supply chains से प्रभावित हो सकते हैं। Bastar जैसे क्षेत्रों में शांति, connectivity और industrial value addition का प्रश्न भी इसी व्यापक economic-security दृष्टि से जुड़ता है।
निष्कर्ष
BRICS भारत की सभी geopolitical समस्याओं का समाधान नहीं है। इसकी ताकत consensus है—और सीमा भी। भारत के लिए इसका अर्थ किसी एक खेमे में जाना नहीं, बल्कि विकल्पों की संख्या बढ़ाना, dependency को diversify करना और बदलती दुनिया में strategic autonomy बनाए रखना है।
